जब पूरी धरती ही अपना गाँव बन जाए — चेतना के अधःपतन से शिव-गुरुत्व की ओर
।।प्रणाम।। आज का युग समस्याओं से भरा हुआ नहीं है, बल्कि समझ के अभाव से जूझ रहा है। युद्ध, तनाव, रोग, पर्यावरण संकट, पारिवारिक विघटन— इन सबका मूल कारण कहीं बाहर नहीं, मानवीय चेतना के अधःपतन में छिपा हुआ है। जब मनुष्य केवल मैं और मेरा तक सिमट जाता है, तब धरती एक घर नहीं, प्रतिस्पर्धा का मैदान बन जाती है। लेकिन जिस दिन— पूरी धरती ही आपको अपना गाँव लगने लगे , उस दिन समझ लीजिए कि चेतना ने दिशा नहीं बदली, स्तर बदल लिया है। 1. चेतना का अधःपतन: आज की मूल समस्या आज मनुष्य के पास: साधन अधिक हैं सूचनाएँ असीम हैं तकनीक अद्भुत है फिर भी: शांति घट रही है करुणा सिकुड़ रही है समझ बिखर रही है क्यों? क्योंकि चेतना नीचे की ओर खिसक गई है— संवेदना से सुविधा की ओर, कर्तव्य से अधिकार की ओर, समष्टि से स्वार्थ की ओर। यह कोई सामाजिक समस्या नहीं, यह चेतना की समस्या है। 2. जब धरती “गाँव” बन जाती है “गाँव” केवल भौगोलिक इकाई नहीं होता। गाँव एक भाव है— जहाँ हर व्यक्ति अपना लगता है जहाँ किसी का दुःख पराया नहीं होता जहाँ संबंध पहले होते हैं, समझौते बाद में जब वही भाव पूरी धरती के लिए जाग्रत हो जाए, तो मनुष्य वैश्...