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मूल कारण

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  ।।प्रणाम।। आज के परिवेश में तमाम समस्याओं का मूल कारण है, मानवीय चेतना का अधःपतन , जिसकी वजह से लोग स्वार्थी हो गए हैं। मानवीय चेतना के पुनरुत्थान के लिए प्रबल "गुरूत्व" की आवश्यकता है, ठीक उसी प्रकार जैसे किसी गहरी खाई में गिर चुके किसी वाहन को निकालने के लिए क्रेन की आवश्यकता होती है, टोचन की नहीं। गुरूत्व का अर्थ ही होता है, "खींचने की ताकत"। "गुरु वही हो सकते हैं जिनमें गुरूत्व हो"। ईश्वर अर्थात "सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चैतन्यात्मा" से ज्यादा गुरूत्व किसमें हो सकता है? शिव गुरु की शिष्यता परिणामदायी है, यह प्रायोगिक तौर पर सिद्ध हो चुका है। सतही तौर पर नहीं, स्थायी समाधान के लिए, समस्या के मूल कारण को दूर करने हेतु... "आइये भगवान शिव को 'अपना' गुरु बनाया जाय"... 3 सूत्रों की सहायता से: 1. दया मांगना: "हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शिष्य पर दया कर दीजिये" (मन ही मन)। 2. चर्चा करना: दूसरों को भी यह सन्देश देना कि, "आइये भगवान शिव को 'अपना' गुरु बनाया जाय"। 3. नमन करना: अपने गुरु क...

मैं उस शिव को प्रणाम करती हूँ, जो मुझमें हैं और जिनमें मैं हूँ — आत्मबोध से अद्वैत तक की यात्रा

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✨एक वाक्य, जो साधना बन जाए “मैं उस शिव को प्रणाम करती हूँ, जो मुझमें हैं और जिनमें मैं हूँ।” यह पंक्ति सुनने में सरल है, पर इसका अर्थ असीम है। यह न केवल एक प्रार्थना है, न केवल भक्ति का भाव है, बल्कि यह अद्वैत चेतना का सीधा उद्घोष है। यह वाक्य हमें मंदिर से भीतर की ओर ले जाता है— जहाँ न मूर्ति है, न दूरी, केवल चेतना है। 🔱 शिव कौन हैं? — प्रतीक से परे सत्य शिव को अक्सर संहारक वैरागी योगी के रूप में देखा जाता है। लेकिन शैव दर्शन कहता है— शिव कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि अवस्था हैं। शिव का अर्थ है— जो सदा है जो शुद्ध है जो चेतन है शिव = शुद्ध चैतन्य 🌊 “जो मुझमें हैं” — भीतर विराजमान शिव जब हम कहते हैं “जो मुझमें हैं” , तो यह कथन बताता है कि— शिव बाहर खोजने की वस्तु नहीं वे हमारे भीतर ही साक्षी रूप में विद्यमान हैं हर विचार, हर अनुभूति, हर श्वास को जानने वाली चेतना ही शिव है ध्यान में जब विचार शांत होते हैं, तो जो शेष बचता है— वही शिव है। 🌌 “और जिनमें मैं हूँ” — सीमाओं का विसर्जन यहाँ साधक एक और ऊँचाई पर पहुँचता है। अब वह यह नहीं कहता कि “शिव मुझमें हैं” बल्कि यह स्वीकार करता है कि— मैं ...

जब पूरी धरती ही अपना गाँव बन जाए — चेतना के अधःपतन से शिव-गुरुत्व की ओर

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।।प्रणाम।। आज का युग समस्याओं से भरा हुआ नहीं है, बल्कि समझ के अभाव से जूझ रहा है। युद्ध, तनाव, रोग, पर्यावरण संकट, पारिवारिक विघटन— इन सबका मूल कारण कहीं बाहर नहीं, मानवीय चेतना के अधःपतन में छिपा हुआ है। जब मनुष्य केवल मैं और मेरा तक सिमट जाता है, तब धरती एक घर नहीं, प्रतिस्पर्धा का मैदान बन जाती है। लेकिन जिस दिन— पूरी धरती ही आपको अपना गाँव लगने लगे , उस दिन समझ लीजिए कि चेतना ने दिशा नहीं बदली, स्तर बदल लिया है। 1. चेतना का अधःपतन: आज की मूल समस्या आज मनुष्य के पास: साधन अधिक हैं सूचनाएँ असीम हैं तकनीक अद्भुत है फिर भी: शांति घट रही है करुणा सिकुड़ रही है समझ बिखर रही है क्यों? क्योंकि चेतना नीचे की ओर खिसक गई है— संवेदना से सुविधा की ओर, कर्तव्य से अधिकार की ओर, समष्टि से स्वार्थ की ओर। यह कोई सामाजिक समस्या नहीं, यह चेतना की समस्या है। 2. जब धरती “गाँव” बन जाती है “गाँव” केवल भौगोलिक इकाई नहीं होता। गाँव एक भाव है— जहाँ हर व्यक्ति अपना लगता है जहाँ किसी का दुःख पराया नहीं होता जहाँ संबंध पहले होते हैं, समझौते बाद में जब वही भाव पूरी धरती के लिए जाग्रत हो जाए, तो मनुष्य वैश्...

सभी गुरु ठग नहीं होते: ढोंग के युग में सच्चे गुरु को कैसे पहचानें?

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"सभी गुरु ठग नहीं होते, लेकिन कुछ ही गुरु होते हैं जो ठग नहीं हैं। और दुर्भाग्य यह है कि हमारे पास इतनी भी सूक्ष्म दृष्टि नहीं बची कि हम पहचान सकें — कौन गुरु है और कौन केवल गुरु का अभिनय कर रहा है।" यह वाक्य आज के आध्यात्मिक परिदृश्य का केवल एक कथन नहीं, बल्कि एक गहरा निदान है। समस्या यह नहीं है कि दुनिया में ठग गुरु मौजूद हैं; असली समस्या यह है कि हमने पहचानने की जिम्मेदारी स्वयं लेने के बजाय दूसरों पर छोड़ दी है। प्रस्तावना: जब श्रद्धा का शोषण होने लगे भारत अनादि काल से गुरु-परंपरा की भूमि रहा है। यहाँ गुरु को ज्ञान का व्यापारी नहीं, बल्कि अज्ञान के अंधकार को काटने वाला एक जीवंत दीप माना गया है। लेकिन वर्तमान समय में, गुरु एक 'ब्रांड' बन कर रह गया है—जहाँ मंच, माइक, कैमरा और भारी-भरकम प्रचार ही मुख्य आधार हैं। यहीं से गुरु-तत्व विकृत होने लगता है और अध्यात्म की शुद्धता खो जाती है। गुरु और ठग के बीच की महीन रेखा शास्त्रों में गुरु की परिभाषा बहुत सटीक दी गई है: "आचार्य वह नहीं जो अधिक बोले, आचार्य वह है जिसकी उपस्थिति में शिष्य भीतर से बदलने लगे।" विडंब...

जब समय नहीं, चेतना पुकारती है — शिव को गुरु बनाने का क्षण

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100, 200 या 400 वर्षों की प्रतीक्षा नहीं— चार युगों के पश्चात धरती पर वह दुर्लभ अवसर आता है, जब शिव केवल पूज्य नहीं रहते, बल्कि गुरु-भाव में अवतरित होते हैं। यह लेख किसी उत्सव, किसी तिथि या किसी बाह्य आयोजन का विवरण नहीं है। यह चेतना के एक ऐसे द्वार की चर्चा है, जिसे यदि समय रहते न पहचाना गया, तो भीड़ में खड़े होकर भी हम चूक सकते हैं। “समय बहुत कम है” — यह चेतावनी भय नहीं जगाती, यह जागरण की पुकार है। जिज्ञासा का प्रथम सूत्र: क्या कुंभ केवल एक मेला है? सामान्य धारणा कहती है— कुंभ वह स्थान है जहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती मिलती हैं। परंतु शिव-दृष्टि इससे आगे जाती है। यदि त्रिवेणी बाह्य है, तो उसका आंतरिक प्रतिबिंब भी होना चाहिए। शास्त्रों, उपनिषदों और नाथ-परंपरा में बार-बार यह संकेत मिलता है कि— गंगा → चेतना की निर्मल धारा यमुना → भाव की गहराई सरस्वती → मौन ज्ञान की सूक्ष्म धारा जब ये तीनों अंदर मिलती हैं, तभी अंतर कुंभ घटित होता है। और तब— जहाँ आप जाते हैं, वहीं कुंभ हो सकता है। विचारोत्तेजक प्रश्न: क्या पुण्य–पाप ही साधना का ...

क्या सचमुच प्रेम का असली स्वरूप सिर्फ शिवभाव से ही प्रकट होता है?

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✨ क्या सचमुच प्रेम का असली स्वरूप सिर्फ शिवभाव से ही प्रकट होता है? सोचिए… हम रोज़ प्रेम की बातें करते हैं, किसी से लगाव, किसी से अपनापन जताते हैं, लेकिन क्या यह सब सचमुच प्रेम है या सिर्फ मोह? 👉 यदि किसी का प्रेम सीमित है—जाति, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र या रिश्ते की सीमाओं तक—तो वह प्रेम नहीं, सिर्फ स्वार्थ है। सच्चा प्रेम वही है, जो सबको समाहित कर सके। और यह तभी संभव है जब हृदय में शिवभाव जाग्रत हो। क्योंकि— 🌿 जिसे शिव से प्रेम है, उसे सब से प्रेम है। 🌿 जिसे शिव से प्रेम नहीं, उसे किसी से प्रेम नहीं। जहां शिवभाव है, वहां भेदभाव नहीं। और जहां भेदभाव है, वहां शिवभाव नहीं। शिव हमें यह सिखाते हैं कि – 🕉 जो शिव का है, वह सबका है। 🕉 और जो सबका है, वह शिव का है। तो आइए, प्रेम की संकीर्ण परिभाषाओं से ऊपर उठकर शिवभाव को अपनाएं— क्योंकि यही वह दृष्टि है जो भेद मिटाती है, सबको जोड़ती है और प्रेम को उसके वास्तविक स्वरूप में प्रकट करती है। ।।प्रणाम।। आज के परिवेश में तमाम समस्याओं का मूल कारण है, "मानवीय चेतना का अधःपतन", जिसकी वजह से लोगों में समझ की कमी हो गई है। मानवीय चेतना के पु...

क्या सचमुच बहुत सारी जानकारी हमें ज्ञानी बना देती है?

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🌱✨ क्या सचमुच बहुत सारी जानकारी हमें ज्ञानी बना देती है? हम अक्सर मान लेते हैं कि जिसने बहुत कुछ पढ़ लिया, बहुत कुछ याद कर लिया — वही सबसे बड़ा ज्ञानी है। लेकिन क्या यह सच है? आपने तोता-रटंत की कहानी तो सुनी होगी। तोता बहुत सारी बातें बोल लेता है, मंत्र तक रट लेता है — लेकिन क्या वह वास्तव में जानता है कि उसका अर्थ क्या है? 🔍 यही अंतर है वागात्मक ज्ञान (शब्दों तक सीमित ज्ञान) और बोधात्मक ज्ञान (अनुभव और समझ से उपजा ज्ञान) में। 👉 जानकारी का ढेर होना कोई गारंटी नहीं कि वह सही समय पर आपके काम आएगा। 👉 वास्तविक ज्ञान वह है, जो जीवन की परिस्थितियों में मार्गदर्शक बन सके। 👉 केवल वही बोध, वही समझ, जो भीतर उतरकर व्यवहार में प्रकट हो — सच्चा ज्ञान कहलाता है। 💡 इसलिए, ज्ञानी बनने के लिए सिर्फ़ पढ़ना, सुनना, और याद करना पर्याप्त नहीं। अनुभव करना, आत्मसात करना और सही समय पर उसे जीवन में उतारना ही सच्चा ज्ञान है। ❓अब सवाल आपसे— क्या आप जानकारी इकट्ठा कर रहे हैं, या उसे जी भी रहे हैं? --- वागात्मक ज्ञान नहीं, बोधात्मक ज्ञान के लिए... ।।प्रणाम।।  "आइये भगवान शिव को 'अपना' गुरु बनाया...

क्या सचमुच यह पूरी पृथ्वी किसी मायाजाल में बंधी हुई है?

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🌍✨ क्या सचमुच यह पूरी पृथ्वी किसी मायाजाल में बंधी हुई है? कभी-कभी लगता है कि सब कुछ जैसे किसी अदृश्य जादू के अधीन हो। लोग भागते जा रहे हैं, सपनों के पीछे, इच्छाओं के पीछे, लेकिन शायद ही कोई रुककर यह देखता है कि असलियत क्या है। 🔮 कहा जाता है— "पूरा संसार एक मायाजाल में बंधा है, और केवल कुछ जागृत आत्माएँ ही उस परदा-पर्दा सच को पहचान पाती हैं।" सोचिए ज़रा— 👉 क्या हम अपने ही भ्रमों और मान्यताओं के कैदी नहीं हैं? 👉 क्या हम वही नहीं मान लेते जो हमें बार-बार दिखाया और सुनाया जाता है? 👉 क्या हमारी चेतना को रोज़मर्रा की चकाचौंध, लोभ और भय ने ढक नहीं रखा? लेकिन… जो भीतर की आँख खोल पाते हैं, वे इस मायाजाल को पार करके सत्य को देख लेते हैं। वही जागृत आत्माएँ हैं। 🪷 जागृति का अर्थ है— सवाल पूछना, भीड़ की अंधी दिशा में न बहना, भीतर की शांति और सच्चाई को पहचानना। याद रखिए: जग संसार के भ्रम-जाल को तोड़ने के लिए किसी बाहरी चमत्कार की नहीं, बल्कि भीतर के जागरण की आवश्यकता है। 💡 तो प्रश्न यह है— आप भीड़ का हिस्सा बने रहना चाहेंगे, या उस थोड़े से वर्ग में शामिल होना चाहेंगे जो सच को देखने...

आप मुझसे खुश तो हैं न सरकार?

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आप मुझसे खुश तो हैं न सरकार? आपकी दया देखकर तो यही लगता है कि आप बहुत खुश हैं। लेकिन यह भी तो हो सकता कि गुरु प्रेम करते हैं अपने सभी शिष्यों से लेकिन खुश किसी किसी से ही रहते हैं? और दया तो जहां प्रेम है वहीं दया है और जहां दया है वहीं प्रेम है। तो यह भी तो हो सकता है कि नाखुश रहते हुए भी गुरु अपने शिष्य पर दया करते रहें, केवल प्रेम के वशीभूत होकर! कम से कम यह तो बता ही दीजिए कि मैं क्या करूं? कि आप मुझसे खुश रहें। अगर आपने भगवान शिव को अपना गुरु नहीं भी माना है तो उनसे यह संवाद कर के देखिए। क्योंकि आज मेरे मन में यही संवाद चला। मुझे मेरा जवाब मिल गया। आपको मिला या नहीं, कमेंट में बताइएगा। 🙏 #मेरे_गुरु_शिव #दया_कर_दीजिए (प्रतीकात्मक चित्र AI से बनाए गए हैं)

तथाकथित "आध्यात्मिक समूहों" में सबसे अधिक पाखंडी लोग क्यों मिलते हैं?

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✨❓क्या आपने कभी गौर किया है— तथाकथित "आध्यात्मिक समूहों" में सबसे अधिक पाखंडी लोग क्यों मिलते हैं? लोग साधु, संत, मुल्ला, पादरी, शिष्य, भक्त इत्यादि का वेश धारण करते हैं, परवचन (प्रवचन नहीं) झाड़ते हैं, दिखावा करते हैं… लेकिन भीतर से वे कितने खाली और असंतुलित होते हैं! आखिर ऐसा क्यों? 🔍 असल कारण बहुत गहरा है— मानव की सबसे बड़ी कमजोरी है प्रशंसा पाने की चाहत। और इस कमजोरी से जन्म लेती है सबसे बड़ी बीमारी—दिखावा करने की आदत। अब प्रश्न यह है कि इंसान को दूसरों की प्रशंसा की इतनी भूख क्यों होती है? 👉 क्योंकि उसकी अपनी अंतरात्मा उसकी प्रशंसा नहीं करती। और जब आत्मा ताली नहीं बजाती, तब मनुष्य बाहर वालों से तालियां बटोरने की कोशिश करता है। 🌿 आपकी आत्मा आपकी प्रशंसा कब करती है? जब आप बिना किसी स्वार्थ, बिना किसी अपेक्षा के, केवल दया के वशीभूत होकर किसी की सहायता करते हैं। उस क्षण आपके भीतर से उठने वाली शांति और संतोष ही सच्ची प्रशंसा है। ⚠️ निष्कर्ष और चेतावनी: आध्यात्मिक मार्ग पर दिखावा और पाखंड केवल आपकी चेतना का और अधिक पतन कर देंगे। यदि सच में उन्नति चाहिए, तो दूसरों से नहीं, अ...

क्या सचमुच समझ और चेतना का विकास दुख बढ़ा देता है?

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🌿❓ क्या सचमुच समझ और चेतना का विकास दुख बढ़ा देता है? अक्सर देखा गया है कि जैसे-जैसे मनुष्य की समझ विकसित होती है, उसकी चेतना का स्तर ऊपर उठता है, वैसे-वैसे वह और अधिक दुखी और चिंतित दिखने लगता है। परंतु यह दुख अपने लिए नहीं होता—यह दुख और चिंता उन लोगों के लिए होती है, जो अभी भी चेतना के अधःपतन में डूबे रहते हैं। ✨ जब चेतना ऊपर उठती है, तब केवल बुद्धि ही नहीं, बल्कि दयाभाव और प्रेम का स्तर भी ऊपर उठने लगता है। यही दया हमें विचलित करती है, क्योंकि हम चाहते हैं कि लोग समझें, जागें, सुधरें—लेकिन जब वे समझने की स्थिति में नहीं होते, तब हमारी असमर्थता का बोध हमें दुखी कर देता है। 👉 असल में समस्या यहाँ है कि हम स्वयं को समझ देने वाला मान लेते हैं। जबकि उपाय यही है कि — लोगों को हमारी समझ से नहीं, बल्कि समझ के मूल स्रोत से जोड़ना चाहिए। यानी हमें किसी को अपनी रोशनी दिखाने के बजाय, उन्हें उस असीम ज्योति तक ले जाने का प्रयास करना चाहिए जहाँ से सभी को अपनी-अपनी समझ स्वतः प्राप्त हो सकती है। 🌸 यही मार्ग है—जहाँ हमारी चिंता कम होगी और दूसरों की चेतना भी स्वतः ऊपर उठने लगेगी। --- ।।प्रणाम।। आज ...

इस संसार का सबसे दुखी जीव कौन है?

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क्या आपने कभी सोचा है— संसार का सबसे शक्तिशाली और सामर्थ्यवान जीव मानव ही क्यों सबसे अधिक दुखी है? अन्य जीव केवल तब दुखी होते हैं जब वे घायल हों, बीमार हों या किसी क्षणिक कष्ट में हों। लेकिन मनुष्य? वह अपने जीवन का बड़ा हिस्सा मानसिक पीड़ा में जीता है—ईर्ष्या, क्रोध, प्रतिशोध, चिंता और असुरक्षा में डूबा हुआ। ❓ आखिर ऐसा क्यों है? 👉 इसका मूल कारण है अहंकार। अहंकार से जन्म लेता है द्वेष, और द्वेष से ईर्ष्या, घृणा व शत्रुता। लेकिन प्रश्न यह है कि अहंकार क्यों उत्पन्न होता है? जैसे अंधकार केवल प्रकाश के अभाव से होता है, वैसे ही अहंकार ज्ञान के अभाव से उत्पन्न होता है। आज की अधिकांश समस्याओं की जड़ यही है— मानवीय चेतना का अधःपतन। लोगों की समझ और संवेदना का क्षय हो जाना। 🌿 तो इसका समाधान क्या है? जिस प्रकार गहरी खाई में गिरे वाहन को निकालने के लिए केवल रस्सी या टोचन नहीं, बल्कि शक्तिशाली क्रेन की आवश्यकता होती है, वैसे ही चेतना के उत्थान के लिए चाहिए प्रबल गुरुत्व। गुरु वही हो सकते हैं जिनमें गुरुत्व हो। और ईश्वर से बड़ा गुरुत्व किसका हो सकता है? 💫 शिव गुरु की शिष्यता परिणामदायी है। यह केव...

तौहीद (एकेश्वरवाद) क्या है?

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  तौहीद (एकेश्वरवाद) क्या है? दृश्य हो या अदृश्य, साकार हो या निराकार, हर रूप में उसी विश्वरूप (ईश्वर) को देखना ही एकेश्वरवाद (तौहीद) है। "सकल राममय यह जग जानी" इसीलिए जिस स्वरूप से भी प्रेम हो, पूजा केवल ईश्वर की ही होती है। केवल अल्पविकसित चेतना के लोग ही किसी की पूजा पद्धति पर निषेध लगा सकते हैं, क्योंकि उन्हें इतनी भी समझ नहीं है कि हर व्यक्ति की चेतना का स्तर और हर व्यक्ति का व्यक्तित्व अलग-अलग होता है, इसीलिए हर व्यक्ति ईश्वर के एक ही स्वरूप के प्रति आकर्षित नहीं हो सकता। किसी पर भी अपनी पसंद जबरदस्ती थोपना केवल और केवल पागलपन है। अध्यात्म और संस्कृति से सुसम्पन्न भारत के लोगों को कबीलाई पागलपन की नकल करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जिनके पूर्वजों ने किसी मजबूरी के तहत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का त्याग किया था, उन्हें घर वापसी करनी चाहिए, अन्यथा किसी कल्पनालोक की आशा में यथार्थ लोक को नष्ट होते देखने की मूर्खता ही एकमात्र विकल्प बचेगा। "स्वरग नरक एही जग माही, करमहीन नर पावत नाहीं" प्रेम की मनोदशा ही स्वर्ग है और घृणा की मनोदशा ही नर्क है। "दया धरम का म...

प्यार या व्यापार

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लोभ या भय से व्यापार किया जाता है, प्यार नहीं। लोभ चाहे स्वर्ग का हो या भय हो नर्क का, या कोई और, अगर पूजा या इबादत का कारण लोभ या भय है, तो यह पूजा है ही नही! क्योंकि ईश्वर से प्रेम को ही भक्ति कहते हैं और भक्तिवश किया गया कोई भी कर्म ही पूजा है। अगर हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम जग जाए, तो बिन मांगे ही वो सबकुछ मिल जाता है, जो मांगने से भी नही मिलता। शिष्य के हृदय में शिव (ईश्वर) के प्रति प्रेम जग जाए, किसी भी गुरु का यही काम है। शिवगुरु का भी यही काम है। आज के परिवेश में तमाम समस्याओं का मूल कारण है, "मानवीय चेतना का अधःपतन", जिसकी वजह से लोगों में समझ की कमी हो गई है और लोग तुच्छ-स्वार्थी हो गए हैं। मानवीय चेतना के पुनरुत्थान के लिए प्रबल "गुरूत्व" की आवश्यकता है, ठीक उसी प्रकार जैसे किसी गहरी खाई में गिर चुके किसी वाहन को निकालने के लिए क्रेन की आवश्यकता होती है, टोचन की नहीं। गुरूत्व का अर्थ ही होता है, "खींचने की ताकत"। "गुरु वही हो सकते हैं जिनमें गुरूत्व हो"। ईश्वर अर्थात "सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चैतन्यात्मा" से ज्यादा गुरूत्व कि...

जरूरत या पसंद

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  इस दुनियां को अच्छी चीजें देना सबसे कठिन काम है, क्योंकि जरुरत है जो लोगों की वो उनकी पसंद नहीं और पसंद है जो लोगों की वो उनकी जरूरत नहीं। उदाहरण के लिए, उपचार के प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए, अगर कम से कम दवा का प्रयोग करते हुए दबे हुए रोगों को बाहर निकाल कर वर्तमान उपचार के साथ साथ भविष्य में होने वाले जटिलताओं से भी बचाव करने वाली चिकित्सा, जो लोगों की जरूरत है, वो आम लोगों की पसंद नहीं है, जबकि भारी मात्रा में बाहरी हस्तक्षेप कर, निकल रहे विकारों को दबा कर, भविष्य में होने वाली गंभीर जटिलताओं का कारण बनने वाली पद्धति आम लोगों की पसंद है! उसी तरह शुद्ध देसी गायों के स्वास्थ्यवर्धक दूध की जगह, विदेशी गायों का अस्वास्थ्यकर दूध, अथवा मिलावट वाले तथा कृत्रिम नकली दूध आम लोगों की पसंद है। जानते हैं क्यों? क्योंकि अधिकांश लोग या तो नासमझ हैं या खुद कमीने हैं। कैसे? अपवादों को छोड़ दें तो आज के दौर में लगभग हर आदमी अपने फायदे के लिए किसी और के नुकसान की कोई परवाह नहीं करता। यहां तक कि मौका मिलते ही गिरी हुई हरकत करता है अगर पकड़े जाने का भय नहीं हो। तो 2 नंबर लोगों को ईश्वर ही ...

सफलता का पैमाना

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 सफलता का पैमाना यह नहीं कि इस जगत से आपने कितना लिया है, बल्कि सफलता का पैमाना यह है कि इस जगत को आपने कितना दिया है। हालांकि देनेवाले तो केवल ईश्वर हैं, लेकिन क्या हममें प्रदाता बनने की, माध्यम बनने की चाहत है? क्या हम लेने की जगह देने को उत्सुक हैं? या केवल दुनियाँ की नजर में स्वयं को सफल सिद्ध करने के लिए, इस जगत का अधिकाधिक दोहन और शोषण करने की ही प्रवृत्ति है? लोगों से प्रशंसा पाने के लिए दिखावा वही करता है, जिसकी अपनी अंतरात्मा उसकी प्रशंसा नहीं करती। आपकी अंतरात्मा आपकी प्रशंसा तब करती है, जब आप बिना किसी अपेक्षा के, बिना किसी लोभ के, यहाँ तक कि बिना किसी की प्रशंसा पाने की चाहत लिए, आप कोई ऐसा कार्य करते हैं जो लोकहित में हो। अब लोकहित भी तो जगदीश्वर ही कर सकते हैं! समाधान अर्थात कल्याण करने का सामर्थ्य तो केवल ईश्वर में है! इसीलिए तो उन्हें शिव कहा गया है! तो हम आप केवल इतना ही करने का प्रयास कर सकते हैं कि लोगों का जुड़ाव उस परमसत्ता से हो सके। इसके लिए भी उस परमगुरु की दया की आवश्यकता है। ।।प्रणाम।। "आइये भगवान शिव को 'अपना' गुरु बनाया जाय"... 3 सूत्रों की ...

Why the God as Guru शिव ही गुरु क्यों

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शिव ही गुरु क्यों? क्या मनुष्य गुरु नहीं हो सकते? बिलकुल हो सकते हैं। यहाँ तक कि, हर मनुष्य गुरु भी है और शिष्य भी। शिव को अपना गुरु बनाने का मतलब, बाँकी गुरुओं की उपेक्षा करना नहीं है। उलटे जगद्गुरु को अपना गुरु बनाने से जगत् का हर चराचर गुरु हो जाता है, चाहे वह स्थूल हो, सूक्ष्म हो, या सूक्ष्मातिसूक्ष्म। लेकिन मनुष्य को गुरु बनाने के लिये, पहले से भी पात्रता की आवश्यकता होती है । जैसे कि, अगर किसी मेडिकल कॉलेज में पढ़ना है, तो पहले से ही 10+2 पास होना चाहिये, बायोलॉजी  से और अगर इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ना है मैथमेटिक्स से। साथ में फिजिक्स, केमिस्ट्री, इंग्लिश इत्यादि। यही कारण है कि, जितने भी शरीरधारी मनुष्य प्रसिद्ध सद्गुरु हुए, उनके गिने चुने ही शिष्य प्रसिद्ध हुए, ज्यादतर मामलों में 1 ही। जैसे कि, रामानंद स्वामी के 1 कबीरदास या रामकृष्ण परमहंस के विवेकानंद। क्योंकि पूर्व-पात्रता वाले शिष्यों का मिलना, अत्यंत दुर्लभ बात है। बात जब आध्यात्मिक गुरु की आती है, तो गुरु मिलना ही दुर्लभ है और योग्य शिष्य मिलना तो और भी दुर्लभ। भौतिक गुरु भौतिक ज्ञान दे सकते हैं, लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान...

शास्त्रों में शिव गुरु

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शिव पुराणः शिवपुराण की रूद्र संहिता में उल्लेख मिलता है कि महादेव जी ने कहा,, विधाता, मैं जन्म और मृत्यु की भय से युक्त अशोभन जीवों की सृष्टि नहीं करूंगा ,क्योंकि वे कर्मों के अधीन हो दुख के समुद्र में डूबे रहेंगे। मैं तो दुख के सागर में डूबे हुए उन जीवों का उधार मात्र करूंगा,गूरू स्वरूप धारण करके, उत्तम ज्ञान प्रदान कर ,उन सबको संसार सागर से पार करूंगा। _______________________________________________ शिवपुराण की वायवीय संहिता में शिव के योगाचार्य होने और उनके 112 शिष्य -प्रशिष्यौं का विशद  वर्णन मिलता है। ________________________________________________ पद्पुराण :पद्मपुराण मूलतः विष्णु जी पर आधारित है और उसमें शिव को जगतगुरु कहा गया है। __________________-____________________________  ब्रह्मवैवर्त पुराण: ब्रह्मवैर्वत पुराण मे ,असित मुनि द्वारा रचित शिव स्त्रोत के प्रथम सुक्त में शिव को जगतगुरु, योगियों के स्वामी और गुरुओं के गुरु भी कहा गया है।श्लोक ईस प्रकार है। जगद्गुरो नमस्तुभ्यं शिवाय शिवदाय च।  योगेंद्रणां च योगिंद्र गुरुणां गुरुवे नमः।। अर्थात हे ! जगत गुरु आपको नम...

सत्ता या शक्ति, देव या देवी।

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जहां सत्ता है, वहीं शक्ति है। जहां शक्ति है, वहीं सत्ता है। जो पंच ज्ञानेन्द्रियों की पकड़ में नहीं आये, उसे सूक्ष्म कहते हैं। संसार में केवल पदार्थ ही नहीं है, चेतना भी है, जिसकी इच्छाशक्ति से पदार्थ की उत्पत्ति होती है। सूक्ष्म सत्ता को देव तथा सूक्ष्म शक्ति को देवी कहा गया है। परम सूक्ष्म सत्ता को महादेव, देवाधिदेव, शिव इत्यादि तथा परम सूक्ष्म शक्ति को महादेवी, पराशक्ति, शिवा इत्यादि कहा गया है। सूक्ष्म, स्थूल से अधिक शक्तिशाली होता है। ज्यादा सूक्ष्म ज्यादा शक्तिशाली होता है। परम सूक्ष्म सत्ता परम शक्तिशाली है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म परम चैतन्यात्मा को ही शिव कहा गया है, क्योंकि वह परम कल्याण करते हैं। गुरु की दया से आदेश की प्राप्ति होती है, जिसमें बल होता है। गुरु जितने सबल होंगे, आदेश में भी उतना ही बल होगा। गुरु की दया अहैतुकी होती है, लेकिन किस पर? शिष्य पर। ।।प्रणाम।। "आइये भगवान शिव को 'अपना' गुरु बनाया जाय"... 3 सूत्रों की सहायता से: 1. दया मांगना: "हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शिष्य पर दया कर दीजिये" (मन ही मन)। 2. चर्चा करना: दूसर...

आदमी निरुपाय है लेकिन...

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मनुष्य जो चाहता है, वो हो नहीं पाता और जो नहीं चाहता वो हो जाता है। जैसे कि मनुष्य बीमार नहीं पड़ना चाहता, मरना नहीं चाहता, अपनों से दूर नहीं होना चाहता, दुखी नहीं होना चाहता, लेकिन होता क्या है? आप किसी को शिव-शिष्य बनाना चाहते हैं, लेकिन कई लोग भगवान शिव को अपना गुरु मानते ही नहीं। जो मानते भी हैं, तो उनमें से अनेक तीनों सूत्रों का पालन नहीं करते। तीनों सूत्रों का पालन करने वालों में से भी कई लोग प्रशंसा पाने के उद्देश्य से, वाहवाही लूटने के उद्देश्य से, सम्मान पाने के उद्देश्य से, प्रमुखता पाने के उद्देश्य से या धन कमाने के लोभ से, करते हैं। मंशा बदल जाने की वजह से दिशा बदल जाती है और दिशा बदल जाने से दशा बदल जाती है। आप चाहते हैं कि ऐसा न हो, लेकिन चाहकर भी कुछ कर नहीं पाते और खुद को निरुपाय की अवस्था में देखते हैं। ऐसी अनेक स्थितियां हैं, या कहिये कि, हर जगह, हर स्थिति में आदमी निरुपाय ही है। जैसे कि, आदमी घर से निकलता है कहीं जाने के लिए, लेकिन सुरक्षित पहुंचेगा कि नहीं, यह केवल उसके हाथ में नहीं है। अर्थात, स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी ने अपने नौकर से सही ही कहा था, "आदमी निरुप...

नमः शिवाय

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अध्यात्म जगत में जो मंत्रों का विज्ञान बना।  मानव का धरती के आकर्षण में जीना स्वभाव है उसकी अपनी शारीरिक जरूरतों के कारण मजबूरी भी। इस जगत में शरीर में आया है  तो उसके जीवन के दो उद्देश्य हैं एक लौकिक सुख सुविधा दूसरा परमात्मा में अपनी वापसी। परमात्मा में अपनी वापसी तब तक नहीं हो सकती जब तक कि वह अपने मूल स्वरूप को ना जान जाए यानी स्वयं की बोधात्मक समझ पैदा ना हो जाए इन्हीं दो उद्देश्यों के लिए मंत्रों का विज्ञान बना पूजाओं की अनेकों अनेक विधियां इस अध्यात्म और जगत में बनी और पूजा अर्चना याचना के आयाम बने। धरती के सुख पाने वाले जो मंत्र हैं उनकी विधि और आयाम अलग है अवधि भी निर्धारित है जिस के क्रम में बहुत सारे मंत्र इस जगत में अनेकों अनेक देवताओं के अनेक अनेक मंत्र बने। हर देवता के नाम से प्रणाम और आवाहन की विधि के निमित्त एक मंत्र विज्ञान है। नमः शिवाय मंत्र विश्व की साधना आराधना की विधियों में मूल मंत्र कहा जाता है बीज मंत्र कहा जाता है। सबसे सर्वोत्तम मंत्र। कहा जाता है कहा जाता है कि नमः शिवाय में 7 हजार करोड़ मंत्रों का समावेश है। धरती का सुख कम अवधि में पाने के लिए और ज...