आपके काम आ सकूं सरकार!
🔱 आपके काम आ सकूं सरकार! (इसमें मेरा क्या जा रहा है!) #मेरे_गुरु_शिव #दया_कर_दीजिए क्या यह वाक्य केवल विनम्रता है? या यह शिष्यत्व का घोष है? जब संसार पूछता है — “मुझे क्या मिलेगा?” शिष्य पूछता है — “मैं कहाँ अर्पित हो सकता हूँ?” यहीं से समर्पण आरम्भ होता है। --- पर एक गहरा प्रश्न — दया पात्रता से मिलती है, या पात्रता दया से? यदि गुरु की दया अहैतुकी है — तो क्या वह किसी योग्यता पर निर्भर हो सकती है? 🔱 नहीं। शिव की दया कारण से बंधी नहीं। वह तो सूर्य के प्रकाश की तरह है — सदैव, सर्वत्र, निरपेक्ष। फिर अंतर क्यों दिखता है? वर्षा सब पर होती है, पर खुला पात्र ही भरता है। उल्टा रखा पात्र खाली रह जाता है। दया कारणरहित है। पर उसे ग्रहण करने की तैयारी — अहं का विसर्जन — शिष्य को करना होता है। --- इसलिए “इसमें मेरा क्या जा रहा है” त्याग नहीं है — यह पात्र को सीधा करने की प्रक्रिया है। हम दया के योग्य नहीं बनते, हम केवल अपने अवरोध हटाते हैं। दया पहले से है। समर्पण उसे अनुभव करने की अवस्था है। --- 🔱 स्मरणीय सूत्र: • दया अहैतुकी है। • पात्रता दया का कारण नहीं, उसका ग्रहण है। • अहं जितन...