मैं उस शिव को प्रणाम करती हूँ, जो मुझमें हैं और जिनमें मैं हूँ — आत्मबोध से अद्वैत तक की यात्रा
✨एक वाक्य, जो साधना बन जाए
“मैं उस शिव को प्रणाम करती हूँ, जो मुझमें हैं और जिनमें मैं हूँ।”
यह पंक्ति सुनने में सरल है,
पर इसका अर्थ असीम है।
यह न केवल एक प्रार्थना है,
न केवल भक्ति का भाव है,
बल्कि यह अद्वैत चेतना का सीधा उद्घोष है।
यह वाक्य हमें मंदिर से भीतर की ओर ले जाता है—
जहाँ न मूर्ति है, न दूरी,
केवल चेतना है।
🔱 शिव कौन हैं? — प्रतीक से परे सत्य
शिव को अक्सर
संहारक
वैरागी
योगी
के रूप में देखा जाता है।
लेकिन शैव दर्शन कहता है—
शिव कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि अवस्था हैं।
शिव का अर्थ है—
जो सदा है
जो शुद्ध है
जो चेतन है
शिव = शुद्ध चैतन्य
🌊 “जो मुझमें हैं” — भीतर विराजमान शिव
जब हम कहते हैं “जो मुझमें हैं”,
तो यह कथन बताता है कि—
शिव बाहर खोजने की वस्तु नहीं
वे हमारे भीतर ही साक्षी रूप में विद्यमान हैं
हर विचार, हर अनुभूति, हर श्वास को जानने वाली चेतना ही शिव है
ध्यान में जब विचार शांत होते हैं,
तो जो शेष बचता है—
वही शिव है।
🌌 “और जिनमें मैं हूँ” — सीमाओं का विसर्जन
यहाँ साधक एक और ऊँचाई पर पहुँचता है।
अब वह यह नहीं कहता कि “शिव मुझमें हैं”
बल्कि यह स्वीकार करता है कि—
मैं स्वयं शिव की चेतना में स्थित हूँ।
यहाँ
मैं और वह का भेद टूटता है
साधक और साध्य एक हो जाते हैं
यही अद्वैत है।
🕉️ “शिवोऽहम्” — अहंकार नहीं, अहं का अंत
बहुत लोग “शिवोऽहम्” को गलत समझ लेते हैं।
यह यह नहीं कहता कि
“मैं ईश्वर हूँ”
बल्कि यह कहता है—
“जो मैं अपने अहंकार में सोचता था, वह मैं नहीं हूँ।”
जब अहं मिटता है,
तो जो बचता है—
वही शिव है।
🙏 “दया कर दीजिए” — सबसे गहरी प्रार्थना
यह कोई डर से की गई याचना नहीं।
यह पुकार है—
हे शिव!
मेरे अज्ञान का आवरण हटा दीजिए
मुझे वही दिखाइए, जो सदा से है
शिव की दया
कोई चमत्कार नहीं,
बल्कि बोध का जागरण है।
🌱 शिव-भक्ति का व्यवहारिक अर्थ
यदि शिव मुझमें हैं,
तो—
मेरा आचरण करुणामय होगा
मेरे शब्द सत्य से जन्म लेंगे
मेरे कर्म हिंसा से मुक्त होंगे
मेरी साधना दिखावे से परे होगी
याद रखिये , शिव भक्ति ही शिव शिष्यता का उद्देश्य है।
🌺 निष्कर्ष: बाहर नहीं, भीतर लौटना ही शिव-पथ है
शिव कहीं दूर नहीं।
शिव किसी विशेष स्थान तक सीमित नहीं।
शिव वही हैं—
जो इस क्षण
इन पंक्तियों को पढ़ने वाली चेतना के रूप में
आपके भीतर जाग्रत हैं।
और जब यह समझ स्थिर हो जाती है,
तब स्वतः निकलता है—
नमः शिवाय।
⚠️ डिस्क्लेमर
यह लेख आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चिंतन पर आधारित है। इसका उद्देश्य आत्मबोध और चेतना-विस्तार है, न कि किसी धार्मिक मत का प्रचार या विरोध। अनुभूतियाँ व्यक्ति की साधना और समझ के अनुसार भिन्न हो सकती हैं।

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