सबसे बड़ा भोग

दुनियां का सबसे बड़ा भोग क्या है?

रानीपतरा (पूर्णियां, बिहार) के बड़े ही प्यारे गुरुभाई आशीष भैया गुरु-चर्चा कर रहे थे। लोग सम्मोहित होकर सुन रहे थे। सौभाग्य से मैं भी सामने ही बैठा हुआ था।

उसी दरम्यान आशीष भैया ने मुझसे पूछ दिया, "दुनियां का सबसे बड़ा भोग क्या है"?

मैंने इस विषय पर पहले कभी नहीं सोचा था और न ही इस सवाल का जवाब मैं जानता था उस समय तक।

लेकिन देखिये मेरे गुरु शिव की दया। जैसे ही मुझसे सवाल पूछा गया, मेरे मुंह से निकल गया, "लोगों का सम्मान पाना"।

आशीष भैया ने कहा, हाँ सम्मान पाना। सम्मान पाना ही दुनियां का सबसे बड़ा भोग है। लोग पैसा भी कमाना चाहते हैं, तो उसके पीछे सम्मान पाने की इच्छा ही मूल कारण होता है। क्योंकि लोग देखते हैं कि, पैसे वालों को
सम्मान मिलता है।

फिर उन्होंने कहा कि सम्मान भी दो तरह से मिलता है। मान लीजिये कि, यहाँ से किसी बहुत ही बड़ी कंपनी का नामी-गिरामी मालिक गुजरता है, तो लोग उसे भी सम्मान देंगे, लेकिन उस सम्मान में स्वार्थ छिपा रहेगा। मन में कहीं न कहीं लोभ रहेगा।

लेकिन अगर किसी शिव-गुरु-कार्य में लगे हुए गुरुभाई को सम्मान मिलता है तो उसमें प्रेम छुपा रहता है। यहाँ सम्मान असली होता है, दिखावे के लिये नहीं और यह सम्मान हृदय को आप्यायित कर देता है। हालांकि यहाँ कार्य करने का उद्देश्य खुद के लिये सम्मान पाना कदापि नहीं होता।

तो शिव-गुरु की शिष्यता में कई चीजें बिना मांगे मिल जाती हैं। दुनियाँ का सबसे बड़ा भोग भी इसमें शामिल है। इन पंक्तियों का लेखक, इसे ही कहता है, "शिव-शिष्यता के साइड-इफेक्ट्स"...

इसीलिये कहा गया है कि, "शिव सम्यक रूप से भोग और मोक्ष के दाता हैं"।

शिव-गुरु की दया से, शिष्य के लौकिक और पारलौकिक मनोरथ, स्वतः पूर्ण हो जाते हैं।

तो आइये जगद्गुरु शिव को "अपना" गुरु बनाया जाय।

इसके लिये, शिव-गुरु की दया से, मानव-जाति को, इस कालखंड के प्रथम शिव-शिष्य, महामानव, वरेण्य गुरु-भ्राता, साहबश्री हरीन्द्रानंद जी के माध्यम से प्रदत्त 3 सूत्र सहायक हैं।

1. दया मांगना:

"हे शिव आप मेरे गुरु हैं, मैं आपका शिष्य हूँ, मुझ शिष्य पर दया कर दीजिये" (मन ही मन)

2. चर्चा करना:

दूसरों को भी यह सन्देश देना कि, "शिव मेरे गुरु हैं, आपके भी हो सकते हैं"

3. नमन करना:

अपने गुरु को प्रणाम निवेदित करने की कोशीश करना। चाहें तो नमः शिवाय का प्रयोग कर सकते हैं। (मन ही मन, सांस लेते समय नमः तथा छोड़ते समय शिवाय)

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